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कृषकों के प्रमुख फसल धान की प्रतिमूर्ति है टुसू - राजेन्द्र बाघबानुआर


टुसू पर्व पर अगहन संक्रांति से लेकर मकर संक्रांति तक टुसू मनी के स्वागत में माह भर चलता है विभिन्न तरह के पीठा का दौर। कृषक के खेत में धान यानी धानी, खलिहान में आते ही डिनी तथा घर में प्रवेश करते ही धान टुसू मनी बन जाती है । अगहन संक्रांति को टुसू थापना के साथ घर में टुसू मनी का प्रवेश होता है। इसके बाद प्रति शाम मांस चारपा, लाउ चकली, भेंडी पीठा, सीम चारपा, चकली पीठ, खापरा पीठा, डुबु पीठा, गुड़ पीठा आदि विभिन्न तरह के पीठा से टुसू मनी का नेइहर में स्वागत होता है। मकर संक्रांति के दूसरे दिन पहली माघ से कुड़माली नववर्ष प्रारंभ होता है। माघ मास में महीना भर गुड़ पीठा के साथ अपने संगी साथियों व सम्बंधियों के घर पहुंच कर बधाई देते हैं।

  कुड़माली साहित्यकार राजेंद्र प्रसाद महतो 'राजेन' बाघबानुआर के अनुसार मकर पर्व के पश्चात माघ महीने में अपने संगी - संबंधी के बीच गुड़ पीठा के आदान - प्रदान करने की एक प्राचीन रस्म है। माघ महीना भर गुड़ पीठा अपने गतिआरी में पहुंचाने की इस परंपरा को कुटमारी कहा जाता हैं । कुटमारी आने वालों का खुब खातिरदारी होता है।

    झारखण्ड के अधिकांश क्षेत्रों में जनजाति व अन्य समुदाय के बीच वर्षों से चली आ रही ये एक अत्यंत प्राचीन संस्कृति है । कुटमारी के बहाने प्रत्येक गतिआ व कुटुम घरों में कम - से - कम माघ महीना में आना - जाना होता हैं ।

        कुटमारी के लिए भोर 4 बजे से उठकर महिलाएं गुड़ पीठा तैयार करतीं हैं । शाम को ही कौन कहाँ किस गतिआ में जायेगा यह निश्चय कर लिया जाता हैं । एक गतिआ घर में कम से कम 5 गनडा और एक पीठा यानी 21 पीठा का खाला तैयार किया जाता हैं । 5 गनडा से ऊपर 7 या 9 गनडा एक पीठा भी एक खाला में डालकर पैक किया जाता है । सील बंद खाला ही पहुचाया जाता है । कच्चे साल के पत्तों को खड़िका से टिप कर खाला तैयार किया जाता है । साल का पत्ता नहीं मिलने पर पलास पत्ता से भी काम चलाया जाता है । एक गाँव में जितने गतिआ घर होते हैं उस गाँव के लिये उतना खाला पीठा का मटरी बनाते हैं । पीठा खाला को मटरी बांधकर या दोउड़ा में सुरक्षित रखकर ढोकर पहुँचाया जाता हैं । पीठा पहुँचाने के क्रम में टुटे नहीं इसका विशेष ख्याल रखा जाता है ।

       विशेषकर महिलाएं अपने बाल - बच्चों के साथ अपनी बाप घर की कुटमारी करतीं हैं । एक - दो रात रहने के बाद ही कुटमारी से वापस आते हैं । जितना खाला पीठा उतना साइञ अलग - अलग घर में मांस मछली का दौर चलता हैं । गतिआ सत्कार के लिये पहले से ही मुर्गा, मुर्गी व बतख की व्यवस्था रहता हैं ।

विदाई के समय घरेलू उत्पाद साग - सब्जी, दाल के आलावा विशेष कर मामा घर से पूंजी रखने के लिए, मुर्गी व बकरी प्रदान करने का भी पारंपरिक प्रथा है। इसके साथ - साथ मामा घर के आलावा मौसी घर, फुफुघर, दीदी घर आदि नजदीकी रिश्तेदार घर से 

  वापस लौटते समय नये कपड़े देकर विदा की जाती हैं । विशेषकर सिंहभूम व रांची के आलावा बंगाल में यह रिवाज आज भी जीवंत हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पीठा खाला का जगह प्लास्टिक व थैला ले लिया है। 

  शादी - विवाह में गुड़ पीठा हाड़ी का एवं विवाह के पश्चात घुरा - फेरी नेग के दौरान गुड़ पीठा खाला का रिवाज रही है, लेकिन वर्तमान समय में पीठा हाड़ी व पीठा खाला का जगह मिठाई का पैकेट ले रहा है।

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