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धनबाद की खूबसूरत वादियों में 'डेथ जोन' बनी तोपचांची झील, माडा की लापरवाही से बढ़ रहे हादसे


 ब्रिटिश काल में वर्ष 1915-1924 के बीच बनी 559 हेक्टेयर में फैली तोपचांची झील आज अपनी सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि बेगुनाह जिंदगियों को निगलने के लिए चर्चा में है।

शुक्रवार को अमन और अरमान की मौत कोई पहली घटना नहीं है।

अगर पिछले कुछ वर्षों के रिकॉर्ड को खंगाला जाए, तो यह झील ''डेथ जोन'' के रूप में उभरती है, जहां माडा प्रशासन सिर्फ प्रवेश शुल्क बटोरने में व्यस्त है और सुरक्षा के नाम पर शून्य है।

*हादसों का डरावना इतिहास, जब-जब उजड़े घर*

तोपचांची झील की लहरें समय-समय पर बेगुनाह जिंदगियों को निगलती रही हैं। पिछला रिकॉर्ड प्रशासन की आपराधिक लापरवाही की गवाही देता है।

*08 मई 2026* (अमन और अरमान): झरिया के धर्मशाला रोड निवासी अमन झुनझुनवाला और उन्हें बचाने के प्रयास में गोविंदपुर के गांव बस्ती निवासी अरमान आलम की जलसमाधि हो गई। शाम को जब दोनों के शव एक-दूसरे से लिपटे हुए निकले, तो मंजर देख हर स्वजन की आंख भर आई।

*मई 2023 (इमरान और एक ही परिवार के दो बच्चे):* तोपचांची के ही इमरान का शव झील से बरामद हुआ था। वह तीन दिन से लापता था और उसका जूता-कपड़ा झील के पुल पर मिला था। इसी दौरान घूंघुसा पंचायत के ऊपर टोला में एक ही परिवार के दो बच्चों की डूबने से मौत की खबर आई थी।

*जनवरी 2021 (रोहित कुमार):* तोपचांची बाजार के ही 16 वर्षीय रोहित कुमार की मौत के बाद शव निकालने में प्रशासन को 26 घंटे लग गए थे, जिसने गोताखोरों की अनुपलब्धता की पोल खोल दी थी।

*मई 2020 (साजिद खान):* तोपचांची निवासी साजिद खान की नहाने के दौरान गहराई में समा जाने से मौत हुई थी।

*अक्टूबर 2018 व दिसंबर 2017 :* सरायढेला के दो युवकों और क्रिसमस में पिकनिक पर आए दो छात्रों की जलसमाधि ने भी सुरक्षा दावों को तार-तार किया था।

*गाद की सफाई के बाद ''अनदेखा'' खतरा*

तकनीकी पहलू पर गौर करें तो गाद निकालने के बाद झील की तलहटी की मिट्टी अभी भी ''अस्थिर'' है। वहां ''सॉफ्ट मड'' (नरम कीचड़) का जमाव है, जिसमें पैर पड़ते ही इंसान धंस जाता है और उसे संभलने का मौका नहीं मिलता।

झील के पास स्थित पुल के समीप का क्षेत्र सबसे अधिक जानलेवा साबित हो रहा है, क्योंकि गहरीकरण के बाद किनारे पर अचानक 15-20 फीट की सीधी ढलान बन गई है। प्रशासन की यह बड़ी चूक है कि सफाई के बाद उस क्षेत्र को असुरक्षित घोषित नहीं किया गया।

*लापरवाही, न लाइफ जैकेट, न बचाव नौका*

विडंबना यह है कि माडा प्रशासन प्रवेश शुल्क तो मुस्तैदी से वसूलता है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर सैलानियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। झील क्षेत्र में सैलानियों को लाइफ जैकेट तक उपलब्ध नहीं कराई जाती।

प्रवेश शुल्क के बदले मिलने वाली रसीद में सुरक्षा गारंटी का कोई जिक्र नहीं होता। 559 हेक्टेयर में फैले इस जलाशय के पास एक भी ''मोटर चालित बचाव नौका'' का न होना प्रशासन की मंशा पर गंभीर सवाल उठाता है।

*स्थानीय युवाओं की नाराजगी और गोताखोरों की मांग*

तोपचांची और आसपास के युवाओं में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि जब स्थानीय युवक स्वेच्छा से गोताखोरी के लिए तैयार हैं, तो माडा उन्हें ''लाइफ गार्ड'' के रूप में प्रशिक्षित और नियुक्त क्यों नहीं करता? यदि आज स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित टीम और संसाधन होते, तो शायद अरमान और अमन को बचाने में इतनी देरी नहीं होती।

सिस्टम की उदासीनता

स्थानीय लोगों का कहना है कि झील से गाद निकालने के बाद किनारे पर जो ढलान बनी है, वह अब ''स्लो डेथ ट्रैप'' बन चुकी है। माडा सालाना करोड़ों का राजस्व वसूलती है, लेकिन यहां आपात स्थिति के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।

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